Thursday, September 20, 2012

रानी   लक्ष्मी बाई  
पिता : श्री मोरो पन्त 
जन्म : १९ नवम्बर १८३५, बनारस में. 
विवाह हुआ झाँसी के राजा गंगाधर राव से. 
१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी से युद्ध छेड़ने वाली अद्वितीय मिशाल पेश की.
ब्रिटिश सेना से युद्ध करते हुए ग्वालियर के निकट १८ जून १८५८ को मात्र २३ वर्ष की अवस्था में शहीद हो गयीं . तत्कालीन जनरल ह्यूरोज ने कहा था कि मुझे भारतीय लड़को में कोई मर्द दिखा तो वो थी रानी लक्ष्मी बाई. आज भी वो हमारी प्रेरणा श्रोत हैं.  

बहादुर शाह जफ़र ( अंतिम मुग़ल सम्राट)
१२ मई १८५७ को बहादुर शाह ने अग्रेंजों के विरुद्ध फरमान जारी किया, किन्तु शीघ्र ही अग्रेंजों ने उनको हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया . विलिअम हडसन ने दिल्ली गेट पर आज जहाँ खुनी दरवाजा स्थित है वहां   पुत्रों और एक पुत्र को गोली से उड़ा दिया , बहादुर शाह को रंगून निर्वासित कर दिया, जहाँ ७ नवम्बर १९६२ को उनका देहांत हो गया. 

तात्याँ टोपे 

तात्या टोपे का जन्म सन 1814 में पूना में हुआ था। तात्या टोपे का वास्तविक नाम- 'रामचंद्र पांडुरंग येवलेकर' था। उनके पिता पांडुरंग अण्णा साहब कहलाते थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के गृह-विभाग का काम देखते थे.  बालकाल बिठूर में पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब और झाँसी की वीरांगन रानी लक्ष्मीबाई के साथ व्यतीत हुआ था। आगे चलकर 1857 में देश की स्वाधीनता के लिए तीनों ने जो आत्मोत्सर्ग किया था वह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विस्फोट होने पर तात्या भी समरांगण में कूद गया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब के प्रति अंग्रेज़ों ने जो अन्याय किये थे, उनकी उसके हृदय में एक टीस थी। उसने उत्तरी भारत में शिवराजपुर, कानपुरकालपी और ग्वालियर आदि अनेक स्थानों में अंग्रेज़ों की सेनाओं से कई बार लोहा लिया था। सन् 1857 के स्वातंत्र्य योद्धाओं में वही ऐसा तेजस्वी वीर था जिसने विद्युत गति के समान अपनी गतिविधियों से शत्रु को आश्चर्य में ड़ाल दिया था। वही एकमात्र एसा चमत्कारी स्वतन्त्रता सेनानी था जिसमे पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सैनिक अभियानों में फिरंगी अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिये थे । आखिर में इनके एक गद्दार मित्र मानसिंह ने तात्या के साथ धोखा करके उसे अंग्रेज़ों को सुपुर्द कर दिया था।१८ अप्रैल १८५९ को  अंग्रेज़ों ने उसे फांसी पर लटका दिया था. 

वेलु थम्पी 
जन्म : ६ मई १७६५ को तमिलनाडु के गाँव कल्कुलम में श्री कुंजन मयेति पिल्लई के घर पैदा हुए. ऐसा मन जाता है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के विरोध में खड़ा होने वाला यह प्रथम युवक था. अग्रेंजो के विरुद्ध रण छेड़ा और घिर जाने पर स्वयं अपनी तलवार से अपनी गर्दन काट कर शहीद हो गए .

नाना साहब 

वास्तविक नाम : धूंधूपंत,  जन्म :  1824 में वेणुग्राम निवासी माधवनारायण राव के घर। इनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा ने बालक नानाराव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया.  । सन् 1857 में वह काल्पी, दिल्ली तथा लखनऊ गए। काल्पी में आपने बिहार के प्रसिद्ध कुँवरसिंह से भेंट की और भावी क्रांति की कल्पना की। जब मेरठ में क्रांति का श्रीगणेश हुआ तो नाना साहब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांति की सेनाओं का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। अग्रेजों को खुली चुनौती दी और हार सामने देख बड़ी पटुता से वह से निकल गए और आन्दोलन को गुप्त रूप से चलाते रहे. अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के निमित्त बड़े बड़े इनाम घोषित किए किंतु वे निष्फल रहे। उनका  आखिरी समय अज्ञात है. 


मंगल पाण्डेय 

मंगल पाण्डेय-1857 के गदर का प्रथम बलिदानी

8 अप्रैल,1857 के दिन बैरकपुर की रेजीमेण्ट के एक सिपाही को फौजी अनुशासन भंग करने तथा हत्या करने के अपराध में फांसी पर चढ़ाया गया। फांसी चढ़ाने के लिए कोई स्थानीय जल्लाद न मिला। कलकत्ता से चार जल्लादों को बुलाकर इस फौजी को फांसी दी गई।यह फौजी था भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रथम योद्धा-मंगल पाण्ड़ेय।
अजीमुल्ला खान  द्वारा अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके तैयार की गई 31मई,1857 के गदर की योजना को क्रियान्वित नाना साहेब पेशवा ने किया, परन्तु मातृभूमि की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले प्रथम योद्धा हैं-मंगल पाण्ड़ेय। भारतीय क्रान्ति के अग्रदूत-मंगल पाण्डेय एक देशभक्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। बैरकपुर की 19नम्बर रेजीमेण्ट के भावुक तथा जोशीले सिपाही मंगल पाण्डेय का क्रोध मानों सातवें आसमान पर जा पहुंचा , जब यह खबर फैली कि अंग्रेजों द्वारा गाय तथा सूअर की चर्बी व खून का प्रयोग करके बनायी गई कारतूसों को रेजीमेण्ट में भेजा गया है। रेजीमेण्ट में असंतोष फैल गया।अंग्रेजों ने समझाया कि यैसा कुछ भी नहीं किया गया है परन्तु गो मांस भक्षी अंग्रेजों की बातों का रेजीमेण्ट में किसी को विश्वास नहीं हुआ। 31मई,1857 के गदर की तैयारी के लिए बैरकपुर में रेजीमेण्ट का मुखिया वजीर अली खान  को बनाया गया था। कारतूसों को इस्तेमाल करने से इंकार कर देने के कारण रेजीमेण्ट को निशस्त्र करने की योजना अंग्रेजों द्वारा बनायी गई। इसकी भनक लगते ही भावुक ह्दय के जोशीले-धार्मिक-देशभक्त मंगल पाण्डेय संभवतः अपने मनोभावों एवं शक्ति पर नियंत्रण न रख सके अपितु रखना भी नहीं चाहा होगा। वो तो बलिदान की सजी हुई वेदी में प्रथम आहुति देने को उद्वेलित मानस था। सोचा होगा,‘‘ विद्रोह करना ही है तो कई मास बाद क्यो।? अभी क्यों नहीं?कहीं बर्मा से गोरी पलटन न आ जाये?‘‘ यह विचार मनो-मस्तिश्क में कौंधने लगे मंगल पाण्डेय के। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक कारणों के साथ-साथ धार्मिक कारण के जुड़ जाने से ज्वाला ने मंगल पाण्डेय के तन-बदन में आग लगा दी। समस्त कारणों ने एक सूत्र में एकत्र होकर गुलामी की बेडियां काटने के लिए मंगल पाण्डेय के भावुक-जोशीले मन को उद्वेलित कर दिया। फिरंगियों के प्रति घृणा,विद्वेष,असंतोष की अग्नि ने 29मार्च,1857 को पहली गोली चलाने पर विवश कर दिया,छेड़ दिया स्वतन्त्रता-संग्राम मंगल पाण्डेय ने। गुलामी की जंजीरों को काटने को बेचैन मन ने किस तरह विद्रोह की आधारशिला रखी,यह इतिहास में दर्ज हो चुका है।
29मार्च,1857 के दिन बैरकपुर की छावनी में अपने कमरे में बैठे मंगल पाण्डेय ने अचानक अपनी बन्दूक को उठाकर, माथे पर लगाकर चूमा। भारत माता की बारम्बार स्तुति करते हुए मंगल पाण्डेय ने बन्दूक में गोली भरी। शेर की तरह वीर मंगल पाण्डेय परेड ग्राउण्ड की तरफ चल पडे़। दमकता ललाट,गर्व से चैडी छाती,बलिदान की महान भावना से ओत-प्रोत आत्मा और नश्वर शरीर मानों साक्षात् काल अपने शिकार की तरफ लपका हो। साथियों ने रोका, मंगल पाण्डेय ने ललकारा, ‘‘व्यर्थ प्रतीक्षा मत करो। चलो,आज ही फैसला करो। आज ही फिरंगियो। का सफाया करो। भाइयों,उठो,आप पीछे क्यों हट रहे हो?‘‘ उन्होंने धर्म की सौगन्ध देते हुए ललकारा, ‘‘स्वतन्त्रता की देवी तुम्हें पुकार रही है और कह रही है कि तुम्हें धोखेबाज तथा मक्कार शत्रुओं पर फौरन आक्रमण बोल देना चाहिए। अब और रूकने की आवश्यकता नहीं है।‘‘ अन्य सिपाहियों के भाव क्रान्तिकारी नेताओं के निर्देशों की डोर में बधें रहे। मंगल पाण्डेय ने सिंहनाद कर दिया। सिंह की चपेट में ब्रितानिया हुकूमत का सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन आ गया। सार्जेन्ट ने मंगल पाण्डेय की गिरफतारी का आदेष दिया, कोई सिपाही आगे नहीं बढ़ा। सिंह की आंखे शोले उगल रही थीं, आत्मा रक्तदान के लिए तड़प रही थी। ठाय की आवाज हुई और सार्जेण्ट ह्यूसन जमीन चाटने लगा। दूसरा अंग्रेज अफसर लेफटीनेण्ट बाॅब घोडे पर सवार होकर मंगल पाण्डेय की तरफ झपटा। मंगल पाण्डेय ने दूसरी गोली चला दी, गोली घोडे को लगी,घोडा व बाब दोनो गिर पडे। बाब ने पिस्टल से मंगल पाण्डेय पर फायर किया। निशाना चूका। मंगल पाण्डेय ने तलवार से अंग्रेज बाब को मौत के घाट उतार दिया। इसी समय एक अंग्रेज ने पीछे से मंगल पाण्डेय पर हमला किया। एक भारतीय सिपाही ने जोर से बन्दूक का कुन्दा उस अंग्रेज के सर पर मारा,अंग्रेज का सिर फट गया और वह धरती पर गिर पड़ा। मंगल पाण्डेय की आखें क्रान्ति की ज्वालायें बरसा रहीं थी। विद्रोह की खबर कर्नल व्हीलर को मिली। परेड-ग्राउण्ड में पहुच कर उसने भारतीय सैनिकों को आज्ञा दी,‘‘पाण्डेय को गिरफतार करो।‘‘ सिपाहियों के मध्य से सिंहनाद हुआ, ‘‘खबरदार,मंगल पाण्डेय को कोई हाथ न लगाये। हम ब्राह्मण देवता का बाल भी बांका न होने दे।गें।‘‘ कर्नल व्हीलर ने अंग्रेजों की लाशें देखीं, मंगल पाण्डेय का रक्त से सना शरीर देखा तथा विद्रोह के मुहाने पर खड़ी फौज को देखा और कुछ सोचता हुआ लौट गया। उसने जनरल हियरे को खबर की। अंग्रेज सेना के साथ हियरे परेड ग्राउण्ड आ धमका। मंगल पाण्डेय ने अंग्रेज सेना को आते देखकर गर्जना की,‘‘भाइयों,बगावत करो,बगावत करो। अब देर करना उचित नहीं। देश को तुम्हारा बलिदान चाहिए।‘‘ परन्तु भारतीय सिपाही 31मई की तय तारीख और क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुशासन के कारण शान्त रहे। मंगल पाण्डेय ने तत्काल अपनी छाती पर नाल रखकर गोली चला दी। वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज जीवित पकड़ कर उनकी दुर्गति कर दें। दुर्भाग्य वश वो मरे नहीं, अंगे्रजों ने फौजी अस्पताल में इलाज कराया।ठीक होने पर उन पर फौजी अनुशासन भंग करने का तथा हत्या का मुकदमा चला। मंगल पाण्डेय ने कहा,‘‘जिन अंग्रेजों पर मैने गोली चलाई, उनसे मेरा कोई बैर नहीं था , झगड़ा व्यक्तियों का नहीं,दो देशों का है। हम नहीं चाहते कि दूसरों के गुलाम बन कर रहें। फिरंगियों को हम अपने देश से निकाल देना चाहते हैं।‘‘अदालत ने मंगल पाण्डेय को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। 8अप्रैल,1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई।

Wednesday, September 19, 2012

आग्रह


देश प्रेमियों,  देश की  आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों एवं क्रांतिकारियों की यादगार पुनः स्थापित करने के लिए बड़े प्रयत्न  से  एक शोध ग्रन्थ का प्रकाशन किया जा रहा है, इस ग्रन्थ में लगभग एक हजार  क्रन्तिकारी और शहीदों का परिचय प्रस्तुत किया गया है, इस संकलन को अंतिम रूप देने के लिए विभिन्न स्रोतों से सहयोग लिया और इसके लिए अंदमान निकोबार स्थित सेलुलर जेल भी मैं गया, उक्त ग्रन्थ में से प्रतिदिन चार क्रांतिकारियों  का संक्षिप्त परिचय आप तक  facebook (http://www.facebook.com/harvilas.gupta.7)   तथा मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित किया जायेगा , यदि आप को मेरा यह प्रयास अच्छा लगे तो उक्त क्रांतिकारियों का जीवन परिचय अपने मित्रों को फॉरवर्ड करें . आप सब की प्रतिक्रिया की अपेक्षा रहेगी ....

Harvilas Gupta

Email: harvilasgupta@gmail.com

Bakht Khan

Born in 1797 ,was the Commander-in-chief of the Indian war of independence in 1857. 
He was related to the Oudh family on his mother side, During the war of independence he arrived at Delhi along with his troop, and emerged as a
 dominant figure of the anti-British war. He established a court of administration at Delhi and made Bahadur Shah Zafar its figure head. Some princes and courtiers thwarted him in his endeavours and his plans were not properly executed. No trace of him was found after the British army entered Delhi.

Jaimangal Pandey and Nadir Ali

These two Rebellion Subadars of the Ramgarh battalion, Jharkhand had led the assault at Chatra, were caught and brought before simpson on 3rd October 1857 and were sentenced to death on 4th October 1857,were hanged on a near 'Phansi Talaab', by Mango tree during the great glorious rebellion of 1857

Veerapandiya Kattabomman

A very brave freedom fighter from Tamilnadu, He is also known as Kattabomma Naicker, he was among the earliest to oppose British rule in these regions. He waged a war with the British six decades before the 1857 Indian War of Independence occurred in the Northern parts of India. He was captured and hanged in 1799 . His fort was destroyed and his wealth was looted by the British army.

Vasudeo Balwant Phadke


            Vasudeo Balwant Phadke

Born on 4 November 1845, in Shirdhon, Raigad, Maharashtra, In 1875. After the then Gaikwad ruler of Baroda was deposed by the British, Phadke launched protest speeches against the government, Vasudev founded an institution, the Aikya Vardhini Sabha, to educate the youth. While working as clerk, Vasudev was not able to see his dying mother due to the delay in approval of h
is leave. This incident enraged Vasudev and happened to be the turning point in his life. Planned to organize several simultaneously attacks against the British Raj nationwide, but arrested and transported to jail at Aden, but escaped from the prison , captured again then went on a hunger strike ttill death on 17 February 1883



भाजपा बेहिचक मोदी को प्रोजेक्ट करे, जीत सुनिश्चित है

बीजेपी सत्ता में आएगी इस बात कि पुष्टि सभी क्षेत्रीय दलों के प्रवक्ताओं के बयान से जाहिर होती है.  सपा, बसपा आदि घबराये हुए हैं यदि यूपीए सरकार गिरती है तो भाजपा सत्ता में आ जाएगी.  मुलायम सिंह, राम गोपाल यादव आदि सपा नेताओं का ये कहना कि हम इस सरकार को गिरने नहीं देंगे जिससे बीजेपी को सत्ता में आने से रोका जा सके. इसका अर्थ है कि यूपीए और उसके समर्थक घटक दलों के कारण जो देश में भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ी है उससे उन्हें लगता है कि उनके पाप का घड़ा भर चुका है और अगर चुनाव होते हैं तो बीजेपी ही सत्ता में आएगी  , इससे ये स्पष्ट होता है कि आज नहीं तो कल भाजपा ही सत्ता में आएगी.  जमीनी स्थिति भी यही है, क्योंकि जनमानस मनमोहन सरकार से त्रस्त है और भाजपा एक मात्र विकल्प है. ऐसे में बीजेपी के नेताओं को अपने अन्दर झांकना होगा कि जनता की भावनाओं  के अनुरूप हम आचरण करें और आपसी मतभेद , मनमुटाव भुलाकर  भावनाओं  का स्वागत करें .  हमने सर्वेक्षण किया है कि आम जनता नरेन्द्र मोदी के नाम पर एकमत दिखाई देती है. हमलोग एक हरिजन बस्ती में गए तो वहां के लोगों ने एक स्वर में कहा कि यदि मोदी जी प्रधान मंत्री पद की उम्मीदवारी में आते है तो हम बेहिचक दलगत भावना से ऊपर उठकर उनका समर्थन ही नहीं उनके लिए काम करेंगे. इसलिए भाजपा बेहिचक मोदी को प्रोजेक्ट करे जीत सुनिश्चित है. 

Tuesday, September 18, 2012

अप्रासंगिक नहीं हुआ है बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा

 उत्तर प्रदेश के बंटवारे की धुर विरोधी समाजवादी पार्टी के सत्तारूढ़ होने से भले ही प्रदेश विभाजन का मसला कुछ वर्षों के लिए अटक  गया सा मालूम पड़ता है . पर इतना  तो तय है कि भविष्य में प्रदेश के चार टुकड़े हों या न हों किन्तु  बुंदेलखंड राज्य देर सबेर बनेगा ही. हालाँकि बुंदेलखंड राज्य गठन के औचित्य के पीछे दर्जनों कारण हैं  पर प्रमुख कारण है यहाँ की विषम भौगोलिक परिस्थितियां और इसका आर्थिक पिछड़ापन . 
      पिछले कुछ वर्षों के दौरान बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी तथा अन्य स्थानीय संगठनों द्वारा किये गए आन्दोलनों की बात की जाये या राहुल गाँधी तथा मायावती द्वारा बुंदेलखंड राज्य के गठन के औचित्य को सार्वजनिक तौर से स्वीकारने की बात हो, यह मुद्दा प्रदेश तथा देश स्तर की  राजनीति में चर्चा का विषय  रहा,  पर हाल ही में संपन्न विधान सभा चुनावों में बुंदेलखंड  राज्य का मुद्दा गौण सा हो गया था. 
           यह विद्रूप ही  है कि विस चुनाव के ऐन पहले तक बुंदेलखंड के प्रति छदम "प्रेम" दर्शाते रहे कांग्रेस तथा बसपा जैसे दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे से काफी  दूरी बनाये रखी. यद्यपि यहाँ के एक दो स्थानीय संगठनों ने विस चुनाव में कुछेक प्रत्याशी उतारे जरूर थे पर बुन्देली मतदाताओं ने इस मुद्दे को कोई तवज्जो नहीं दी . इन सब बातों से एकबारगी तो लगता है कि मानो बुन्देलखंडी लोगों ने ही अपनी मांग को नकार दिया है . किन्तु इतनी जल्दी में यह  निष्कर्ष निकालना तार्किक नहीं होगा कि यह मुद्दा  अब अप्रासंगिक हो गया है. 
   यदि सर्वेक्षण कराया जाये तो परिणाम सामने आएगा कि बुंदेलखंड की 90 फीसदी जनता बुंदेलखंड  राज्य गठन की दिल से हिमायती है. बता दें कि चार वर्ष पहले 29 जुलाई 2008 को "बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी " के आह्वान पर सम्पूर्ण "बुंदेलखंड बंद"  के दौरान यहाँ के मोची और पान  की दुकान लगाने वालों से लेकर क्रेशर मालिकों तक सभी ने अपने प्रतिष्ठान स्वेच्छा से एक दिन के लिए बंद कर  प्रतीकात्मक हामी भरी थी कि वे बुंदेलखंड  राज्य के पक्षधर हैं.  उनका यह सहयोग स्वाभाविक भी था क्योंकि वे  जानते है कि बुंदेलखंड राज्य का गठन उनके  दीर्घकालिक विकास की गारंटी है . 
       पर प्रश्न उठता है कि यह मुद्दा चुनावों में राजनीतिक रंग क्यों नहीं ला पाता है? इसके पीछे प्रमुखतः दो कारण हैं . प्रथम  कारण तो सुप्रसिद्ध  प्रबंधकीय चिन्तक तथा दार्शनिक अब्राहम मास्लो  के  " आवश्यकता सिद्धांत"  से स्पष्ट होता है कि जब तक मनुष्य की मूल शारीरिक आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं हैं तब तक वह अपनी  सामाजिक तथा  राजनीतिक आवश्यकताओं के प्रति नहीं सोचता है. बुंदेलखंड में बार बार सूखा तथा अकाल की त्रासदी से यहाँ का आम आदमी दशकों से भीषण गरीबी का दंश झेल रहा है . वह दिल से चाहता तो है कि बुंदेलखंड राज्य बने ताकि यहाँ विकेन्द्रित विकास हो और उसकी आने वाली पीढियां निर्धनता के अभिशाप से मुक्ति पा सकें . पर यह  भी सच है कि परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ छोड़कर वह आन्दोलन के लिए समय नही दे सकता है. चुनावों के समय भी कहीं न कहीं  उसकी गरीबी ही आड़े आती है जब राजनीतिक आकाओं द्वारा उसकी  गरीबी का फायदा उठाते हुए कागज के चंद टुकड़े फेंक कर, ऋण बसूली का दबाव डालकर या भय दिखाकर उसका वोट हड़प लिया जाता है.  
  दूसरा  कारण है,  बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले संगठनों में समन्वय का अभाव तथा प्रभावी केन्द्रीय नेतृत्व  की कमी . यहाँ "बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी" के अलावा  "बुंदेलखंड  मुक्ति मोर्चा" तथा "बुंदेलखंड कांग्रेस" जैसे अन्य छोटे संगठन भी है किन्तु सबकी अपनी अपनी ढपली तथा सबका अपना अपना राग है. मुक्ति मोर्चा  के संस्थापक  शंकर लाल मेहरोत्रा के निधन के बाद आन्दोलन छिन्न भिन्न सा हो गया था विशेषकर जब इसकी कमान सिने अभिनेता राजा बुंदेला के हाथ में आयी.  दरअसल मुम्बई में बैठकर बुंदेलखंड की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती थी. मुद्दे में उत्पन्न निर्वात की स्थिति को भरने के लिए 2006 में गठित बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के जमीनी आंदोलनों से काफी हद तक जनांदोलन जैसी स्थिति बनने लगी थी पर अन्य स्थानीय संगठनो के असहयोगी रवैये से परिणाम अपेक्षानुकूल नहीं मिले. 
 राजा बुंदेला ने भारी भूल तब कर दी जब पिछले वर्ष मुक्ति मोर्चा छोड़कर जल्दबाजी में एक तीसरे संगठन " बुंदेलखंड कांग्रेस " का गठन कर चार दिन का होम वर्क किये बिना ही विधान सभा चुनाव में भाग ले लिया. इतने गंभीर विषय को मुद्दा बनाकर बिना पर्याप्त जनसंपर्क किये वि चुनाव में उतरना उनका बचपना साबित हुआ.इसलिए बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर उन्हें मिला वोट प्रतिशत मुद्दे के प्रति जनाकांक्षाओं का अंश मात्र भी प्रतिनिधित्व नहीं करता है. लिहाजा उनके संगठन की बुरी पराजय को बुंदेलखंड राज्य की मांग को अप्रासंगिक का देना पूरी तरह गैर लाज़मी है .

Monday, September 17, 2012

भाजपा नेताओं से अपील


भारत की हिन्दू मानस जनता (हिन्दू , मुस्लिम , सिख , इसाई ) आप की ओर आशा भरी निगाह से देख  रही है और भारत का भविष्य आप में देख रही है.  किन्तु संगठन में नित्य कुछ न कुछ अटपटा होता देख साधारण  व्यक्ति भी उद्विग्न हो उठता है .  वह  आप से अपेक्षा रखता है कि  आप लोग  आपस के मान अपमान को त्याग कर केवल संगठन हित में आचरण करें . देश आप सब से अपेक्षा करता है कि पद प्रतिष्ठा और पैसा से ऊपर उठकर केवल देश हित में काम करें और ऐसा ही आपके आचरण से दिखना भी चाहिए . यदि आप अपने मान प्रतिष्ठा , आपसी खींचा तानी में लगे रहेंगे तो देश की दशा क्या होगी आप इससे अनभिज्ञ नहीं है. समाज का हर वर्ग हर घटक आप से अपेक्षा करता है कि इस देश को यदि कोई सही दिशा दे सकता है तो भारतीय जनता पार्टी. आप भूल जाइये कि कौन प्रधान मंत्री बनेगा? किसको प्रोजेक्ट किया जायेगा ? यह प्रतिश्पर्धा  का विषय नहीं होना चाहिए. राष्ट्र कल्याण हेतु सर्वस्व  त्याग की  भावना रखते हुए " मैं  नहीं तू " की  शैली अपनाएं.  निश्चित ही आने वाला समय आपका होगा , और यदि आप झूठे मान प्रतिष्ठा की  लड़ाई में उलझे रहे तो आने वाली पीढ़ी आपको माफ़ नहीं करेगी. 

राहुल गाँधी का मौन : बड़ा होता प्रश्न चिन्ह

कांग्रेसी जन राहुल गाँधी को अपने युवराज की संज्ञा देते आये हैं और आज कांग्रेसी तथा कांग्रेस प्रायोजित मीडिया को उनमे भावी प्रधानमंत्री के लक्षण भले ही  दिखाई दे रहे हों पर समसामयिक विषयों पर जो वैचारिक प्रतिक्रिया की  अपेक्षा उनसे स्वाभाविक थी वह कम से कम मुझे दिखाई नहीं दे रही है.  जिस समय मैं बुंदेलखंड में जमीनी स्तर पर कार्य कर रहा था तो वहां यदा कदा राहुल गाँधी को लोगों के बीच में आकर उनका दुःख दर्द बांटते हुए  देख मुझे एक बार तो लगा था कि यह युवक कुछ नया जरूर करेगा पर २००९ का लोस चुनाव समाप्त होते ही उनमे परिवर्तन आने शुरू हो हो गए  थे और अब तो वे आये दिन अज्ञातवास में ही रहते हैं . विशेषकर पिछले दो वर्षों में कितने ही बड़े बड़े मुद्दों पर देश में राजनीतिक और वैचारिक धमाचौकड़ी मची रही पर राहुल ने मुह तक नहीं खोला.  चाहे भ्रष्टाचार की  बात हो या काले धन की, टू जी स्पेक्ट्रम मामला हो या राष्ट्रमंडल खेलो का घोटाला, अब मंहगाई का मुद्दा हो या एफडीआई का मसला , ऐसे अति संवेदनशील मामलों में  उनकी चुप्पी से उनकी कार्यक्षमता पर ही नहीं बल्कि उनके ध्येय पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है. यह प्रश्न चिन्ह तब और भी लम्बा हो जाता है जब संसद में इन महत्वपूर्ण विषयों पर बहस चल रही होती है और वे एक सांसद होने के नाते भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते हैं बल्कि सिर्फ मूक दर्शक बने रहते हैं.  आज से ठीक तीन वर्ष  पहले १७ सिंबर २००९ को दस जनपथ यानि राहुल के निवास से फोन आया कि उन्होंने कल मुझे मुलाकात के लिए वहां बुलाया है तो एक बार मुझे लगा कि वे शायद बुंदेलखंड मसले पर कोई विमर्श जरूर करेंगे . पर मेरा पूर्वानुमान गलत साबित हुआ. उनमे कुछ नया करने की जो ललक मुझे समाचार माध्यमों में उनकी ख़बरों से दिखाई पड़ती थी वह प्रत्यक्ष वार्ता में नहीं दिखी. उस दिन मैंने तो निष्कर्ष निकाल  लिया था कि राहुल  को  महिमा मंडित किया जा रहा है प्रायोजित मीडिया के उपयोग से.  आज राहुल गाँधी अपने राजनीतिक कद और शक्ति का सदुपयोग  करते तो देश के लिए बहुत कुछ कर सकते थे किन्तु अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ. सामर्थ्यवान होते हुए भी उनकी तरफ से  देश और देश वासियों की भलाई में कोई दिलचस्पी नहीं लेने से उनकी नेतृत्व क्षमता तथा मंशा दोनों संदेह के दायरे में आ जाते हैं. 

Sunday, September 16, 2012

यहाँ भी मैच फिक्सिंग

डीजल  की  कीमत वृद्धि  और एफ डी आई विवाद  : सरकार और सहयोगी दलों की नूरा कुश्ती


डीजल , रसोई गैस के दाम बढ़ने और एफडीआई को खुदरा क्षेत्र में लागू करने से सरकार के कुछ सहयोगी  क्षेत्रीय दलों ने जो  नाराजगी जताई है, वह क्या दर्शाती है? मायावती ९ या १० अक्टूबर को अपना रुख स्पष्ट करने को कह रही है, ममता जी ने २ दिन का समय दिया है. सपा से  तीन अलग अलग बातें सामने आ रही हैं,. मुलायम सिंह प्रधान मंत्री बनने की उधेड़बुन के हिसाब से   बातें  कर रहे हैं, अखिलेश जी  एफडीआई  लागू तो  नहीं करेंगे पर केंद्र सरकार भी नहीं गिरने देंगे.  राम गोपाल  यादव जी  एफडीआई  लागू करने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं. 
यह सब देख कर मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है- एक पंडित जी से गर्भवती  पुत्र बधू की सास पूछती है कि पंडित जी मेरी बहु को लड़का जन्मेगा कि लड़की ? पंडित जी  कहते हैं कि अरे जजमान लड़का ही होगा . जब वही पंडित जी  पड़ोसन के पास जाते है और पड़ोसन उनसे पूछती है कि पंडित जी  मेरी पड़ोसन को क्या होगा तो पंडित जी  कहते हैं  सच्चाई तो यही है जो मैं सिर्फ तुझे बता रहा हूँ  कि उसके तो लड़की होगी.  उसकी सास नाराज न हो इसलिए मैंने उसे लड़का बताया है.यानि कि पंडित जी  के दोनों हाथों में लड्डू,  क्योंकि दोनों पडोसने  खुश. लड़का हुआ तो पंडित जी  कि वाह वाह और लड़की हुई तो भी  पंडित जी  कि वाह वाह .  कमोबेश यही पंडित जी वाली  स्थिति आज सपा, बसपा जैसे  दलों की है. जो सरकार से कुछ और जनता से कुछ बोलते हैं . 
मैंने तो सभी क्षेत्रीय नेताओं के बयानों को सुनकर यही निष्कर्ष निकला है कि यह एक नूरा कुश्ती है और बिलकुल मैच फिक्सिंग कि तरह का खेल है.   प्रधान मंत्री जी इतना जोखिम भरा बड़ा कदम अपने  सहयोगियों को विस्वास में लिए बिना उठा ही नहीं सकते थे .इसलिए सच तो यही है कि इन घोषणाओं के  सार्वजनिक होने से पहले अंदरखाने सब तय हो गया था कि आप सब अपना अपना हल्ला मचाना और हम अपना काम करेंगे, क्योंकि यह छूट तो है ही कि राज्य अपने यहाँ एफडीआई लागू करें या नहीं . इसलिए जनता भ्रम में न रहे यह   मैच  फिक्सिंग का करिश्मा है. 

Thursday, September 13, 2012

हिंदी को क्षेत्रीय सीमाओं से न बांधें

आज हिंदी दिवस है १४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया था  कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी ।

 इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् १९५३ से संपूर्ण भारत में १४ सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर यह दुर्भाग्य की बात है कि आज हिंदी उस जगह पर नहीं है, जहां उसे होना चाहिए था.    डॉ. राम मनोहर लोहिया ने प्रत्येक भारतीय क्षेत्र के निवासी को सलाह दी थी कि वे कम से कम जहां जिस क्षेत्र या प्रदेश में रह रहे हों, वहां की स्थानीय भाषा को सीखें, उसका आदर करें, उसी स्थानीय भाषा को वहां पर बोलचाल में अपनाएं पर  इसी के साथ समूचे भारत के लोगों को हिंदी अवश्य सीखने की बात रखी थी जो मेरे लिहाज से बिलकुल ठीक थी. दर असल हिंदी को क्षेत्रीयता की सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए , बल्कि वह तो पूरे राष्ट्र की  आधिकारिक भाषा है जिसे संवैधानिक मान्यता प्राप्त है.  इसलिए हर भारतीय का नैतिक ही नहीं कानूनी दायित्व भी है कि वह इसे उसी तरह सम्मान दे जिस तरह हम अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को सम्मान देते  हैं.  आज हिंदी पूरे विश्व में  दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है , विश्व में  ६० करोड़ से अधिक लोग हिंदी भाषी हैं किन्तु इसे उस अनुपात में गौरव हासिल नहीं हो पाया. इसके पीछे कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार हैं ,  हमारे स्वयं के द्वारा इसकी उपेक्षा करना इसकी प्रगति में बाधक रहा है. आज हम इसे संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा बनाने की मांग तो करते हैं पर अपने ही देश में इसे उपेक्षित कर अंग्रेजी बोलने में अपना बड़प्पन समझते हैं , और तो और हम अपने घरों में भी अंग्रेजी बोलना अच्छा समझते हैं . आज चीन, जापान  और कोरिया जैसे कई अन्य  राष्ट्र सिर्फ अपनी ही भाषा को प्रयोग में लाते हैं, जबकि हमारे देश में तो गृह मंत्री, प्रधान मंत्री  सभी हिंदी से परहेज़ करते हैं, यहाँ तो गैर हिंदी भाषी लोग हिंदी भाषी लोगो के साथ  एक दूसरी नस्ल की  तरह व्यवहार करते हैं. जो की राष्ट्रद्रोह से कम नहीं है.  यहाँ मुझे भारतेंदु हरिश्चंद्र की दो पंक्तिया याद आ रही हैं ---

     " निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति कौ मूल ,
बिन निज भाषा ज्ञान के , मिटत न हिय कौ शूल ."

मेरा भी यही मन्ना है कि  भूमंडलीकरण के इस दौर में अन्य भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त करें इसमें कोई बुराई नहीं पर अपनी भाषा से परहेज न करें. इसे समुचित सम्मान दे क्योकि इसके चिर अस्तित्व से ही हमारी सांस्कृतिक विरासत संरक्षित होगी.
  हिंदी दिवस पर समस्त देशवासियों को शुभ कामनाएं...

युग पुरुष पंडित दीन दयाल जी के जन्म दिन पर विशेष


25 सितंबर  को भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय का 97 वाँ जन्म दिवस हैं. वे मूलत: एक चिंतक, सृजनशील विचारक, प्रभावी लेखक और कुशल संगठनकर्ता थे. दीनदयालजी भारतीय राजनीतिक चिंतन में एक नए विकल्प 'एकात्म मानववाद' के मंत्रद्रष्टा थे. मेरा मानना है कि पूज्य पंडित जी के महान व्यक्तित्व को समग्रता एवं सटीकता से प्रस्तुत करने का साहस तो किसी कलम में  है और ही किसी जिभ्या में. उन्हें एक दार्शनिक कहा जाये या समाजसेवीउन्हें एक पत्रकार कहा जाये या साहित्यकार, नेता कहा जाये या कार्यकर्ता, इसका निश्चय कर पाना किसी के लिए भी मुश्किल होगा, क्योंकि सच तो ये है कि वे एक  सम्पूर्ण  व्यक्ति थे, उनका व्यक्तित्व समस्त महान विशेषताओं का संकलित समुच्चय था. उनके मार्ग दर्शन और नेतृत्व में  जन संघ ने जो नयी ऊचाइयां हासिल कीं   उसके पीछे उनका दर्शन था,  " कार्य कर्ता को आगे बढ़ाना" और " मैं  नहीं तू" की   शैली अपनाना. आज पुनः उनके उसी  दर्शन की आवश्यकता है जब  हम आपसी प्रतिस्पर्धा और अहम् भाव को त्याग  संगठन को सर्वोपरि मानकर चलें , ताकि हम अपनी अनुशासित छवि को समाज में पुनर्स्थापित कर सकेंइस पावन अवसर पर हम उनके सहज , सरल और समर्पित जीवन से प्रेरणा लें , यही हमारी  उनके प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी .