कांग्रेसी जन राहुल गाँधी को अपने युवराज की संज्ञा देते आये हैं और आज कांग्रेसी तथा कांग्रेस प्रायोजित मीडिया को उनमे भावी प्रधानमंत्री के लक्षण भले ही दिखाई दे रहे हों पर समसामयिक विषयों पर जो वैचारिक प्रतिक्रिया की अपेक्षा उनसे स्वाभाविक थी वह कम से कम मुझे दिखाई नहीं दे रही है. जिस समय मैं बुंदेलखंड में जमीनी स्तर पर कार्य कर रहा था तो वहां यदा कदा राहुल गाँधी को लोगों के बीच में आकर उनका दुःख दर्द बांटते हुए देख मुझे एक बार तो लगा था कि यह युवक कुछ नया जरूर करेगा पर २००९ का लोस चुनाव समाप्त होते ही उनमे परिवर्तन आने शुरू हो हो गए थे और अब तो वे आये दिन अज्ञातवास में ही रहते हैं . विशेषकर पिछले दो वर्षों में कितने ही बड़े बड़े मुद्दों पर देश में राजनीतिक और वैचारिक धमाचौकड़ी मची रही पर राहुल ने मुह तक नहीं खोला. चाहे भ्रष्टाचार की बात हो या काले धन की, टू जी स्पेक्ट्रम मामला हो या राष्ट्रमंडल खेलो का घोटाला, अब मंहगाई का मुद्दा हो या एफडीआई का मसला , ऐसे अति संवेदनशील मामलों में उनकी चुप्पी से उनकी कार्यक्षमता पर ही नहीं बल्कि उनके ध्येय पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है. यह प्रश्न चिन्ह तब और भी लम्बा हो जाता है जब संसद में इन महत्वपूर्ण विषयों पर बहस चल रही होती है और वे एक सांसद होने के नाते भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते हैं बल्कि सिर्फ मूक दर्शक बने रहते हैं. आज से ठीक तीन वर्ष पहले १७ सिंबर २००९ को दस जनपथ यानि राहुल के निवास से फोन आया कि उन्होंने कल मुझे मुलाकात के लिए वहां बुलाया है तो एक बार मुझे लगा कि वे शायद बुंदेलखंड मसले पर कोई विमर्श जरूर करेंगे . पर मेरा पूर्वानुमान गलत साबित हुआ. उनमे कुछ नया करने की जो ललक मुझे समाचार माध्यमों में उनकी ख़बरों से दिखाई पड़ती थी वह प्रत्यक्ष वार्ता में नहीं दिखी. उस दिन मैंने तो निष्कर्ष निकाल लिया था कि राहुल को महिमा मंडित किया जा रहा है प्रायोजित मीडिया के उपयोग से. आज राहुल गाँधी अपने राजनीतिक कद और शक्ति का सदुपयोग करते तो देश के लिए बहुत कुछ कर सकते थे किन्तु अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ. सामर्थ्यवान होते हुए भी उनकी तरफ से देश और देश वासियों की भलाई में कोई दिलचस्पी नहीं लेने से उनकी नेतृत्व क्षमता तथा मंशा दोनों संदेह के दायरे में आ जाते हैं.
जरा याद इन्हें भी करलो ..................................................................... प्रस्तुति : हरविलास गुप्ता
Monday, September 17, 2012
राहुल गाँधी का मौन : बड़ा होता प्रश्न चिन्ह
कांग्रेसी जन राहुल गाँधी को अपने युवराज की संज्ञा देते आये हैं और आज कांग्रेसी तथा कांग्रेस प्रायोजित मीडिया को उनमे भावी प्रधानमंत्री के लक्षण भले ही दिखाई दे रहे हों पर समसामयिक विषयों पर जो वैचारिक प्रतिक्रिया की अपेक्षा उनसे स्वाभाविक थी वह कम से कम मुझे दिखाई नहीं दे रही है. जिस समय मैं बुंदेलखंड में जमीनी स्तर पर कार्य कर रहा था तो वहां यदा कदा राहुल गाँधी को लोगों के बीच में आकर उनका दुःख दर्द बांटते हुए देख मुझे एक बार तो लगा था कि यह युवक कुछ नया जरूर करेगा पर २००९ का लोस चुनाव समाप्त होते ही उनमे परिवर्तन आने शुरू हो हो गए थे और अब तो वे आये दिन अज्ञातवास में ही रहते हैं . विशेषकर पिछले दो वर्षों में कितने ही बड़े बड़े मुद्दों पर देश में राजनीतिक और वैचारिक धमाचौकड़ी मची रही पर राहुल ने मुह तक नहीं खोला. चाहे भ्रष्टाचार की बात हो या काले धन की, टू जी स्पेक्ट्रम मामला हो या राष्ट्रमंडल खेलो का घोटाला, अब मंहगाई का मुद्दा हो या एफडीआई का मसला , ऐसे अति संवेदनशील मामलों में उनकी चुप्पी से उनकी कार्यक्षमता पर ही नहीं बल्कि उनके ध्येय पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है. यह प्रश्न चिन्ह तब और भी लम्बा हो जाता है जब संसद में इन महत्वपूर्ण विषयों पर बहस चल रही होती है और वे एक सांसद होने के नाते भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते हैं बल्कि सिर्फ मूक दर्शक बने रहते हैं. आज से ठीक तीन वर्ष पहले १७ सिंबर २००९ को दस जनपथ यानि राहुल के निवास से फोन आया कि उन्होंने कल मुझे मुलाकात के लिए वहां बुलाया है तो एक बार मुझे लगा कि वे शायद बुंदेलखंड मसले पर कोई विमर्श जरूर करेंगे . पर मेरा पूर्वानुमान गलत साबित हुआ. उनमे कुछ नया करने की जो ललक मुझे समाचार माध्यमों में उनकी ख़बरों से दिखाई पड़ती थी वह प्रत्यक्ष वार्ता में नहीं दिखी. उस दिन मैंने तो निष्कर्ष निकाल लिया था कि राहुल को महिमा मंडित किया जा रहा है प्रायोजित मीडिया के उपयोग से. आज राहुल गाँधी अपने राजनीतिक कद और शक्ति का सदुपयोग करते तो देश के लिए बहुत कुछ कर सकते थे किन्तु अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ. सामर्थ्यवान होते हुए भी उनकी तरफ से देश और देश वासियों की भलाई में कोई दिलचस्पी नहीं लेने से उनकी नेतृत्व क्षमता तथा मंशा दोनों संदेह के दायरे में आ जाते हैं.
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