Thursday, September 20, 2012

रानी   लक्ष्मी बाई  
पिता : श्री मोरो पन्त 
जन्म : १९ नवम्बर १८३५, बनारस में. 
विवाह हुआ झाँसी के राजा गंगाधर राव से. 
१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी से युद्ध छेड़ने वाली अद्वितीय मिशाल पेश की.
ब्रिटिश सेना से युद्ध करते हुए ग्वालियर के निकट १८ जून १८५८ को मात्र २३ वर्ष की अवस्था में शहीद हो गयीं . तत्कालीन जनरल ह्यूरोज ने कहा था कि मुझे भारतीय लड़को में कोई मर्द दिखा तो वो थी रानी लक्ष्मी बाई. आज भी वो हमारी प्रेरणा श्रोत हैं.  

बहादुर शाह जफ़र ( अंतिम मुग़ल सम्राट)
१२ मई १८५७ को बहादुर शाह ने अग्रेंजों के विरुद्ध फरमान जारी किया, किन्तु शीघ्र ही अग्रेंजों ने उनको हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार कर लिया . विलिअम हडसन ने दिल्ली गेट पर आज जहाँ खुनी दरवाजा स्थित है वहां   पुत्रों और एक पुत्र को गोली से उड़ा दिया , बहादुर शाह को रंगून निर्वासित कर दिया, जहाँ ७ नवम्बर १९६२ को उनका देहांत हो गया. 

तात्याँ टोपे 

तात्या टोपे का जन्म सन 1814 में पूना में हुआ था। तात्या टोपे का वास्तविक नाम- 'रामचंद्र पांडुरंग येवलेकर' था। उनके पिता पांडुरंग अण्णा साहब कहलाते थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के गृह-विभाग का काम देखते थे.  बालकाल बिठूर में पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब और झाँसी की वीरांगन रानी लक्ष्मीबाई के साथ व्यतीत हुआ था। आगे चलकर 1857 में देश की स्वाधीनता के लिए तीनों ने जो आत्मोत्सर्ग किया था वह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के विस्फोट होने पर तात्या भी समरांगण में कूद गया था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहब के प्रति अंग्रेज़ों ने जो अन्याय किये थे, उनकी उसके हृदय में एक टीस थी। उसने उत्तरी भारत में शिवराजपुर, कानपुरकालपी और ग्वालियर आदि अनेक स्थानों में अंग्रेज़ों की सेनाओं से कई बार लोहा लिया था। सन् 1857 के स्वातंत्र्य योद्धाओं में वही ऐसा तेजस्वी वीर था जिसने विद्युत गति के समान अपनी गतिविधियों से शत्रु को आश्चर्य में ड़ाल दिया था। वही एकमात्र एसा चमत्कारी स्वतन्त्रता सेनानी था जिसमे पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के सैनिक अभियानों में फिरंगी अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिये थे । आखिर में इनके एक गद्दार मित्र मानसिंह ने तात्या के साथ धोखा करके उसे अंग्रेज़ों को सुपुर्द कर दिया था।१८ अप्रैल १८५९ को  अंग्रेज़ों ने उसे फांसी पर लटका दिया था. 

वेलु थम्पी 
जन्म : ६ मई १७६५ को तमिलनाडु के गाँव कल्कुलम में श्री कुंजन मयेति पिल्लई के घर पैदा हुए. ऐसा मन जाता है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के विरोध में खड़ा होने वाला यह प्रथम युवक था. अग्रेंजो के विरुद्ध रण छेड़ा और घिर जाने पर स्वयं अपनी तलवार से अपनी गर्दन काट कर शहीद हो गए .

नाना साहब 

वास्तविक नाम : धूंधूपंत,  जन्म :  1824 में वेणुग्राम निवासी माधवनारायण राव के घर। इनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा ने बालक नानाराव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया.  । सन् 1857 में वह काल्पी, दिल्ली तथा लखनऊ गए। काल्पी में आपने बिहार के प्रसिद्ध कुँवरसिंह से भेंट की और भावी क्रांति की कल्पना की। जब मेरठ में क्रांति का श्रीगणेश हुआ तो नाना साहब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांति की सेनाओं का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। अग्रेजों को खुली चुनौती दी और हार सामने देख बड़ी पटुता से वह से निकल गए और आन्दोलन को गुप्त रूप से चलाते रहे. अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के निमित्त बड़े बड़े इनाम घोषित किए किंतु वे निष्फल रहे। उनका  आखिरी समय अज्ञात है. 


मंगल पाण्डेय 

मंगल पाण्डेय-1857 के गदर का प्रथम बलिदानी

8 अप्रैल,1857 के दिन बैरकपुर की रेजीमेण्ट के एक सिपाही को फौजी अनुशासन भंग करने तथा हत्या करने के अपराध में फांसी पर चढ़ाया गया। फांसी चढ़ाने के लिए कोई स्थानीय जल्लाद न मिला। कलकत्ता से चार जल्लादों को बुलाकर इस फौजी को फांसी दी गई।यह फौजी था भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रथम योद्धा-मंगल पाण्ड़ेय।
अजीमुल्ला खान  द्वारा अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करके तैयार की गई 31मई,1857 के गदर की योजना को क्रियान्वित नाना साहेब पेशवा ने किया, परन्तु मातृभूमि की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले प्रथम योद्धा हैं-मंगल पाण्ड़ेय। भारतीय क्रान्ति के अग्रदूत-मंगल पाण्डेय एक देशभक्त तथा धर्मपरायण व्यक्ति थे। बैरकपुर की 19नम्बर रेजीमेण्ट के भावुक तथा जोशीले सिपाही मंगल पाण्डेय का क्रोध मानों सातवें आसमान पर जा पहुंचा , जब यह खबर फैली कि अंग्रेजों द्वारा गाय तथा सूअर की चर्बी व खून का प्रयोग करके बनायी गई कारतूसों को रेजीमेण्ट में भेजा गया है। रेजीमेण्ट में असंतोष फैल गया।अंग्रेजों ने समझाया कि यैसा कुछ भी नहीं किया गया है परन्तु गो मांस भक्षी अंग्रेजों की बातों का रेजीमेण्ट में किसी को विश्वास नहीं हुआ। 31मई,1857 के गदर की तैयारी के लिए बैरकपुर में रेजीमेण्ट का मुखिया वजीर अली खान  को बनाया गया था। कारतूसों को इस्तेमाल करने से इंकार कर देने के कारण रेजीमेण्ट को निशस्त्र करने की योजना अंग्रेजों द्वारा बनायी गई। इसकी भनक लगते ही भावुक ह्दय के जोशीले-धार्मिक-देशभक्त मंगल पाण्डेय संभवतः अपने मनोभावों एवं शक्ति पर नियंत्रण न रख सके अपितु रखना भी नहीं चाहा होगा। वो तो बलिदान की सजी हुई वेदी में प्रथम आहुति देने को उद्वेलित मानस था। सोचा होगा,‘‘ विद्रोह करना ही है तो कई मास बाद क्यो।? अभी क्यों नहीं?कहीं बर्मा से गोरी पलटन न आ जाये?‘‘ यह विचार मनो-मस्तिश्क में कौंधने लगे मंगल पाण्डेय के। क्रान्ति की धधकती ज्वाला में आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक कारणों के साथ-साथ धार्मिक कारण के जुड़ जाने से ज्वाला ने मंगल पाण्डेय के तन-बदन में आग लगा दी। समस्त कारणों ने एक सूत्र में एकत्र होकर गुलामी की बेडियां काटने के लिए मंगल पाण्डेय के भावुक-जोशीले मन को उद्वेलित कर दिया। फिरंगियों के प्रति घृणा,विद्वेष,असंतोष की अग्नि ने 29मार्च,1857 को पहली गोली चलाने पर विवश कर दिया,छेड़ दिया स्वतन्त्रता-संग्राम मंगल पाण्डेय ने। गुलामी की जंजीरों को काटने को बेचैन मन ने किस तरह विद्रोह की आधारशिला रखी,यह इतिहास में दर्ज हो चुका है।
29मार्च,1857 के दिन बैरकपुर की छावनी में अपने कमरे में बैठे मंगल पाण्डेय ने अचानक अपनी बन्दूक को उठाकर, माथे पर लगाकर चूमा। भारत माता की बारम्बार स्तुति करते हुए मंगल पाण्डेय ने बन्दूक में गोली भरी। शेर की तरह वीर मंगल पाण्डेय परेड ग्राउण्ड की तरफ चल पडे़। दमकता ललाट,गर्व से चैडी छाती,बलिदान की महान भावना से ओत-प्रोत आत्मा और नश्वर शरीर मानों साक्षात् काल अपने शिकार की तरफ लपका हो। साथियों ने रोका, मंगल पाण्डेय ने ललकारा, ‘‘व्यर्थ प्रतीक्षा मत करो। चलो,आज ही फैसला करो। आज ही फिरंगियो। का सफाया करो। भाइयों,उठो,आप पीछे क्यों हट रहे हो?‘‘ उन्होंने धर्म की सौगन्ध देते हुए ललकारा, ‘‘स्वतन्त्रता की देवी तुम्हें पुकार रही है और कह रही है कि तुम्हें धोखेबाज तथा मक्कार शत्रुओं पर फौरन आक्रमण बोल देना चाहिए। अब और रूकने की आवश्यकता नहीं है।‘‘ अन्य सिपाहियों के भाव क्रान्तिकारी नेताओं के निर्देशों की डोर में बधें रहे। मंगल पाण्डेय ने सिंहनाद कर दिया। सिंह की चपेट में ब्रितानिया हुकूमत का सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन आ गया। सार्जेन्ट ने मंगल पाण्डेय की गिरफतारी का आदेष दिया, कोई सिपाही आगे नहीं बढ़ा। सिंह की आंखे शोले उगल रही थीं, आत्मा रक्तदान के लिए तड़प रही थी। ठाय की आवाज हुई और सार्जेण्ट ह्यूसन जमीन चाटने लगा। दूसरा अंग्रेज अफसर लेफटीनेण्ट बाॅब घोडे पर सवार होकर मंगल पाण्डेय की तरफ झपटा। मंगल पाण्डेय ने दूसरी गोली चला दी, गोली घोडे को लगी,घोडा व बाब दोनो गिर पडे। बाब ने पिस्टल से मंगल पाण्डेय पर फायर किया। निशाना चूका। मंगल पाण्डेय ने तलवार से अंग्रेज बाब को मौत के घाट उतार दिया। इसी समय एक अंग्रेज ने पीछे से मंगल पाण्डेय पर हमला किया। एक भारतीय सिपाही ने जोर से बन्दूक का कुन्दा उस अंग्रेज के सर पर मारा,अंग्रेज का सिर फट गया और वह धरती पर गिर पड़ा। मंगल पाण्डेय की आखें क्रान्ति की ज्वालायें बरसा रहीं थी। विद्रोह की खबर कर्नल व्हीलर को मिली। परेड-ग्राउण्ड में पहुच कर उसने भारतीय सैनिकों को आज्ञा दी,‘‘पाण्डेय को गिरफतार करो।‘‘ सिपाहियों के मध्य से सिंहनाद हुआ, ‘‘खबरदार,मंगल पाण्डेय को कोई हाथ न लगाये। हम ब्राह्मण देवता का बाल भी बांका न होने दे।गें।‘‘ कर्नल व्हीलर ने अंग्रेजों की लाशें देखीं, मंगल पाण्डेय का रक्त से सना शरीर देखा तथा विद्रोह के मुहाने पर खड़ी फौज को देखा और कुछ सोचता हुआ लौट गया। उसने जनरल हियरे को खबर की। अंग्रेज सेना के साथ हियरे परेड ग्राउण्ड आ धमका। मंगल पाण्डेय ने अंग्रेज सेना को आते देखकर गर्जना की,‘‘भाइयों,बगावत करो,बगावत करो। अब देर करना उचित नहीं। देश को तुम्हारा बलिदान चाहिए।‘‘ परन्तु भारतीय सिपाही 31मई की तय तारीख और क्रान्तिकारी आन्दोलन के अनुशासन के कारण शान्त रहे। मंगल पाण्डेय ने तत्काल अपनी छाती पर नाल रखकर गोली चला दी। वह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज जीवित पकड़ कर उनकी दुर्गति कर दें। दुर्भाग्य वश वो मरे नहीं, अंगे्रजों ने फौजी अस्पताल में इलाज कराया।ठीक होने पर उन पर फौजी अनुशासन भंग करने का तथा हत्या का मुकदमा चला। मंगल पाण्डेय ने कहा,‘‘जिन अंग्रेजों पर मैने गोली चलाई, उनसे मेरा कोई बैर नहीं था , झगड़ा व्यक्तियों का नहीं,दो देशों का है। हम नहीं चाहते कि दूसरों के गुलाम बन कर रहें। फिरंगियों को हम अपने देश से निकाल देना चाहते हैं।‘‘अदालत ने मंगल पाण्डेय को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। 8अप्रैल,1857 को मंगल पाण्डेय को फांसी दे दी गई।

No comments: