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सितंबर को भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय का 97 वाँ जन्म दिवस हैं. वे मूलत: एक चिंतक, सृजनशील विचारक, प्रभावी लेखक और कुशल संगठनकर्ता थे. दीनदयालजी भारतीय राजनीतिक चिंतन में एक नए विकल्प 'एकात्म मानववाद' के मंत्रद्रष्टा थे. मेरा मानना है कि पूज्य पंडित जी के महान व्यक्तित्व को समग्रता एवं सटीकता से प्रस्तुत करने का साहस न तो किसी कलम में है और न ही किसी जिभ्या में. उन्हें एक दार्शनिक कहा जाये या समाजसेवी , उन्हें एक पत्रकार कहा जाये या साहित्यकार, नेता कहा जाये या कार्यकर्ता, इसका निश्चय कर पाना किसी के लिए भी मुश्किल होगा, क्योंकि सच तो ये है कि वे एक सम्पूर्ण व्यक्ति थे, उनका व्यक्तित्व समस्त महान विशेषताओं का संकलित समुच्चय था. उनके मार्ग दर्शन और नेतृत्व में जन संघ ने जो नयी ऊचाइयां हासिल कीं
उसके पीछे उनका दर्शन था, " कार्य कर्ता को आगे बढ़ाना" और " मैं नहीं तू" की
शैली अपनाना. आज पुनः उनके उसी दर्शन की आवश्यकता है जब हम आपसी प्रतिस्पर्धा और अहम् भाव को त्याग संगठन को सर्वोपरि मानकर चलें , ताकि हम अपनी अनुशासित छवि को समाज में पुनर्स्थापित कर सकें, इस पावन अवसर पर हम उनके सहज , सरल और समर्पित जीवन से प्रेरणा लें , यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी .जरा याद इन्हें भी करलो ..................................................................... प्रस्तुति : हरविलास गुप्ता
Thursday, September 13, 2012
युग पुरुष पंडित दीन दयाल जी के जन्म दिन पर विशेष
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सितंबर को भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय का 97 वाँ जन्म दिवस हैं. वे मूलत: एक चिंतक, सृजनशील विचारक, प्रभावी लेखक और कुशल संगठनकर्ता थे. दीनदयालजी भारतीय राजनीतिक चिंतन में एक नए विकल्प 'एकात्म मानववाद' के मंत्रद्रष्टा थे. मेरा मानना है कि पूज्य पंडित जी के महान व्यक्तित्व को समग्रता एवं सटीकता से प्रस्तुत करने का साहस न तो किसी कलम में है और न ही किसी जिभ्या में. उन्हें एक दार्शनिक कहा जाये या समाजसेवी , उन्हें एक पत्रकार कहा जाये या साहित्यकार, नेता कहा जाये या कार्यकर्ता, इसका निश्चय कर पाना किसी के लिए भी मुश्किल होगा, क्योंकि सच तो ये है कि वे एक सम्पूर्ण व्यक्ति थे, उनका व्यक्तित्व समस्त महान विशेषताओं का संकलित समुच्चय था. उनके मार्ग दर्शन और नेतृत्व में जन संघ ने जो नयी ऊचाइयां हासिल कीं
उसके पीछे उनका दर्शन था, " कार्य कर्ता को आगे बढ़ाना" और " मैं नहीं तू" की
शैली अपनाना. आज पुनः उनके उसी दर्शन की आवश्यकता है जब हम आपसी प्रतिस्पर्धा और अहम् भाव को त्याग संगठन को सर्वोपरि मानकर चलें , ताकि हम अपनी अनुशासित छवि को समाज में पुनर्स्थापित कर सकें, इस पावन अवसर पर हम उनके सहज , सरल और समर्पित जीवन से प्रेरणा लें , यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होगी .
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